जब बंदूकें चींखी
खामोश हुए इंसान
इंसानों की जात,
और रूहें गूँज उठी
वो जिस्म भरी रूहें....
कुछ ऐसी नई रूहें
जो आज ही पनपी थीं
क़दमों से कुचल डाली
और खून से भर डाला
पानी का एक कुँआ
कोई गोश्त का टुकडा सा
वहां अब भी पड़ा होगा
उस बाग से उस दिन की
बस! बास नही जाती
खामोश हुए इंसान
इंसानों की जात,
और रूहें गूँज उठी
वो जिस्म भरी रूहें....
कुछ ऐसी नई रूहें
जो आज ही पनपी थीं
क़दमों से कुचल डाली
और खून से भर डाला
पानी का एक कुँआ
कोई गोश्त का टुकडा सा
वहां अब भी पड़ा होगा
उस बाग से उस दिन की
बस! बास नही जाती

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