सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

जलिया वाला बाग

जब बंदूकें चींखी

खामोश हुए इंसान

इंसानों की जात,

और रूहें गूँज उठी

वो जिस्म भरी रूहें....

कुछ ऐसी नई रूहें

जो आज ही पनपी थीं

क़दमों से कुचल डाली

और खून से भर डाला

पानी का एक कुँआ

कोई गोश्त का टुकडा सा

वहां अब भी पड़ा होगा

उस बाग से उस दिन की

बस! बास नही जाती